⚫सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी: महाराष्ट्र लोकल बॉडी चुनावों में 50% से ज्यादा आरक्षण पर रोक
⚫57 निकायों का भविष्य कोर्ट के फैसले पर
नई दिल्ली, 26 नवंबर 2025: महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों के आरक्षण विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को कड़ा संदेश दिया कि 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा का उल्लंघन होने पर चुनावी नतीजों का फैसला अदालत ही करेगी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) संजीव सूर्यकांत और जस्टिस जॉय माल्या की बेंच ने सुनवाई को शुक्रवार तक टाल दिया, लेकिन साथ ही स्पष्ट कर दिया कि जिन 57 लोकल बॉडीज में आरक्षण की सीमा पार हो चुकी है, वहां के चुनाव कोर्ट के अंतिम फैसले पर निर्भर रहेंगे।
यह मामला अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण को लेकर लंबे समय से ठप पड़े महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़ा है। राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने बेंच को बताया कि 242 म्युनिसिपल काउंसिल और 42 नगर पंचायतों के चुनाव 2 दिसंबर को निर्धारित हैं। इनमें से 288 निकायों में 57 जगहों पर 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण लागू हो गया है। सिंह ने आगे कहा कि जिला परिषद, नगर निगम और पंचायत समितियों के चुनाव अभी अधिसूचित होने बाकी हैं।
सीजेआई सूर्यकांत ने तल्ख लहजे में कहा, "ये 57 निकाय कार्यवाही के नतीजे पर निर्भर करेंगे। आप जो भी आगे के चुनाव अधिसूचित करेंगे, उन्हें 50 प्रतिशत की सीलिंग लिमिट का सख्ती से पालन करना होगा।" बेंच ने राज्य निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि आगामी अधिसूचनाओं में आरक्षण की सीमा पार न हो। महाराष्ट्र सरकार ने सुनवाई से पहले समय मांगा था, दावा करते हुए कि वे इस मुद्दे पर आयोग से सलाह ले रहे हैं।
ओबीसी आरक्षण का लंबा इंतजार: 2021 से ठप चुनाव
यह विवाद दिसंबर 2021 से चला आ रहा है, जब सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण पर रोक लगाते हुए कहा था कि इसे लागू करने से पहले 'ट्रिपल टेस्ट' (डेटा संग्रह, क्वांटम तय करना और प्रभाव मूल्यांकन) पूरा करना जरूरी है। इसके बाद मार्च 2022 में राज्य सरकार ने जयंत कुमार बंठिया आयोग गठित किया, जिसकी जुलाई 2022 में रिपोर्ट आई।
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने बंठिया रिपोर्ट के आधार पर पुराने कानून के अनुसार ओबीसी आरक्षण देकर चार महीने में चुनाव कराने का आदेश दिया। लेकिन पिछले हफ्ते की सुनवाई में बेंच ने राज्य अधिकारियों को फटकार लगाई कि उन्होंने आदेश का गलत अर्थ निकाला और 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण लागू कर दिया। मौखिक टिप्पणी में कोर्ट ने जोर दिया कि आरक्षण तय सीमा के भीतर ही रहना चाहिए।
राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार, बाकी बचे जिला परिषद, नगर निगम और पंचायत समितियों के चुनावों को अभी अधिसूचित किया जाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट का यह फैसला न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश के स्थानीय निकाय चुनावों के लिए मिसाल बनेगा, जहां आरक्षण नीतियां अक्सर विवादों में घिरी रहती हैं।
शुक्रवार की सुनवाई में राज्य सरकार और आयोग को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मौका मिलेगा। तब तक, 57 विवादित निकायों के मतदाता बेचैन इंतजार में हैं, क्योंकि उनके चुनाव का भविष्य सुप्रीम कोर्ट के इशारे पर टिका है। क्या यह विवाद समय पर चुनाव कराने की राह में एक और बाधा बनेगा, या राज्य जल्द समाधान निकालेगा? आने वाले दिनों में साफ होगा।
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